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Home All Updates (194) साधक अंशित के आध्यात
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साधक अंशित के आध्यात्मिक अनुभवों पर आधारित लेख: ध्यान क्यों व कैसे किया जाय?? मानसिक असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए, चित्तवृत्तियों के बिखराव को एकीकरण के द्वारा एकाग्रता की स्थिति में लाने के लिए ध्यान से श्रेष्ठ कोई उपाय नहीं। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ सारे समाज में साधनों को बटोरने की बेवजह बेतहाशा दौड़-सी चल रही है, प्रायः सभी का मन असंतुलित, बिखरा हुआ-तनावग्रस्त देखा जाता है। कई बार मन क्रोध, शोक, प्रतिशोध, विक्षोभ, कामुकता जैसे उद्वेगों में फँस जाता है। उस स्थिति में किसी का हित नहीं सधता। अपना या पराया किसी का भी कुछ अनर्थ हो सकता है। उद्विग्नताओं के कारण आज समाज में सनकी-विक्षिप्त स्तर के व्यक्ति बढ़ते जा रहे हैं। सही निर्णय करना तो दूर वे कब आत्मघाती कदम उठा लेंगे, समझ में नहीं आता। इन विक्षोभों से मन-मस्तिष्क को उबारने का एक ही उपाय है- मन को विचारों के संयम का-संतुलित स्थिति बनाए रखने का अभ्यस्त बनाने पर जोर दिया जाय। इसी का नाम ‘ध्यान साधना’ है। मन को अमुक चिन्तन प्रवाह से हटाकर अमुक दिशा में नियोजित करने की प्रक्रिया ही ध्यान कहलाती है। शुभारंभ के रूप में भटकाव के स्वेच्छाचार से मन को हटाकर एक नियत-निर्धारित दिशा में लगाने के प्रयोगों का अभ्यास किया जाय तो शीघ्र सफलता मिलती है। कहा गया है कि जो अपने को वश में कर लेता है। गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता (अध्याय 2)। बार-बार जब वे इन्द्रियों को वश में रखने की बात कहते हैं तो उसमें सबसे प्रधान है मन, जिसके इशारे पर शेष सारी इन्द्रियाँ नाचती हैं। आत्मनियंत्रण से प्रज्ञा के प्रतिष्ठित होने का पथ प्रशस्त होता है व उसके लिए बेसिर-पैर की दौड़ लगाने वाला अनगढ़ विचारों को बार-बार घसीटकर श्रेष्ठ-चिन्तन के प्रवाह में लाने का प्रयास-पुरुषार्थ करना पड़ता है। आसान नहीं है यह, पर असंभव भी नहीं। यदि यह किया जा सका तो आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से लाभ मिलते हैं। जहाँ इस वैचारिक तन्मयता की फलश्रुति आध्यात्मिक जगत में प्रसुप्त शक्तियों के जागरण से लेकर ईश्वरप्राप्ति-रसौ वै सः की आनन्दानुभूति के रूप में प्राप्त होती है, वहाँ भौतिक क्षेत्र में अभीष्ट प्रयोजनों में पूरी तन्मयता-तत्परता नियोजित होने से कार्य का स्तर ऊँचा उठता है, सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है और बढ़ी-बढ़ी उपलब्धियाँ मिलती हैं। वस्तुतः विचारों का, श्रेष्ठ सकारात्मक विचार-प्रवाहों का व्यक्तित्व को कराया गया स्नान ही ध्यान है। सूक्ष्म व कारण सत्ता पर नित्य जमने वाले कषाय-कल्मषों की धुलाई इसी ध्यान रूपी साबुन से हो सकती है। ध्यान है। ध्यानयोग का मूलभूत लक्ष्य है- साधक को अपनी मूलभूत स्थिति के बारे में, अपने आपे के बारे में बोध कराना। उसकी उस स्मृति को वापस लौटाना, जिससे कि वह भटका हुआ देवता अपने मूलस्वरूप को जान सके। आज का हर व्यक्ति आत्मविस्मृत मनःरोगी की स्थिति में जी रहा है। ऐसी स्थिति में व्यथित-ग्रसित लोग स्वयं तो घाटे में रहते ही हैं, अपने परिचितों, संबंधियों को भी दुखी करते रहते हैं। विस्मरण का निवारण एवं आत्मबोध की भूमिका में पुनः जागरण, यही है ध्यानयोग का लक्ष्य। किसी संत ने कहा है कि ध्यान किया नहीं जाता है, हो जाता है। सही भी है, जब ध्यान के लिए मन पर बलात् दबाव डाला जाता है, मन अपनी चंचलता के शिखर पर पहुँचकर बहुत नचाता है। इसीलिए ध्यान के लिए बारबार श्रेष्ठ चिन्तन के प्रवाह को बुलाना, उन्हीं में रमण करना ध्यान होने की स्थिति ला देता है। मानवी मन वस्तुतः जंगली हाथी की तरह है, जिसे पकड़ने के लिए पालतू-प्रशिक्षित हाथी भेजने पड़ते हैं। सधी हुई बुद्धि पालतू हाथी का कार्य करती है। ध्यान के रस्से से जकड़कर उसे काबू में लाती है और फिर श्रेष्ठ प्रयोजनों में संलग्न हो सकने योग्य सुसंस्कृत बनाती है। ध्यान के लिए इसी से सविचार स्थिति प्रारंभिक साधकों के लिए श्रेष्ठ है। धीरे-धीरे निर्विचार-निर्विकल्प स्थिति आती है। इसीलिए ध्यान में तन्मयता-तल्लीनता का भाव पैदा करने के लिए सृजनात्मक-विधेयात्मक चिंतन का अभ्यास करने की बात पर बार-बार जोर दिया जाता रहा है। तन्मयता की फलश्रुतियाँ अपार हैं। वैज्ञानिकगण अपने विषय में तन्मय हो जाते हैं और विचार समुद्र में गहरे गोते लगाकर नई-नई खोजों के रत्न ढूँढ़ लाते हैं। साहित्यकार-चिंतक-मनीषी तन्मयता के आधार पर ही राष्ट्रोत्थान के, समाज के नवनिर्माण के चिंतन को जन्म दे पाते हैं। तन्मय स्थिति में होना अर्थात् शरीर से परे होने का भाव पैदा कर स्वयं को विचार समुद्र में डुबा देना। लोकमान्य तिलक के जीवन की एक प्रसिद्ध घटना है कि जब उनके अँगूठे में एक फोड़े को चीरा लगाया जाना था, तो डॉक्टरों ने आपरेशन की गंभीरता बताकर दवा सुंघाकर बेहोश करने का प्रस्ताव रखा। उनने कहा कि “मैं अपने को गीता के प्रगाढ़ अध्ययन में लगा दूँ। आप बेखटके आपरेशन कर लें।” डॉक्टरों को सुखद आश्चर्य हुआ कि पूरी अवधि में वे बिना हिले-डुले गीता पढ़ते रहे-शान्तिपूर्वक आपरेशन करा लिया। पूछने पर इतना ही कहा कि “तन्मयता इतनी प्रगाढ़ थी कि आपरेशन की ओर ध्यान नहीं नहीं गया और दर्द भी नहीं हुआ।” विचारों के बिखराव का एकीकरण-चित्तवृत्तियों का निरोध यदि किया जा सके तो मनुष्य दुनिया के बुद्धिमानों की तुलना में असंख्य गुनी विचारशीलता, प्रज्ञा, भूमा प्राप्त कर सकता है, मात्र समझदार न कहलाकर तत्व द्रष्टा कहला सकता है। आत्मिक प्रगति का अभीष्ट प्रयोजन भी पूरा कर सकता है। मेडीटेशन-मनोनिग्रह की योग के प्रकरण में अक्सर चर्चा होती है, पर यह है वस्तुतः चित्त की वृत्तियों का अधोगामी चिंतन प्रवाह का निरोध एवं तदुपरान्त ऊर्ध्वीकरण। इसके लिए निराकरण ध्यान भी किया जा सकता है व साकार भी। कई व्यक्ति इसी ऊहापोह में रहते हैं कि कौन-सा ध्यान श्रेष्ठ है-निराकार या साकार। ध्यान उपासना के साथ जब भी जोड़ा जाता है, वह आत्मिक प्रगति के साथ भौतिक प्रगति का भी लक्ष्य पूरा करता है। ईश्वरप्राप्ति-जीवनलक्ष्य की प्राप्ति जैसे महानतम उद्देश्यों के कारण उपासना व ध्यान परस्पर जोड़कर किये जाते हैं व तुरंत लाभ भी देते हैं। विभिन्न संप्रदायों तथा विधियों में उसके प्रकारों में थोड़ा-बहुत अंतर भले ही हो, पर ध्यान का समावेश हर पद्धति में है। साकार ध्यान में भगवान की अमुक मनुष्याकृति को मानकर चला जाता है-उनके गुणों का ध्यान किया जाता है, वहीं निराकार ध्यान में प्रकाशपुँज पर आस्था जमाई जाती है। सूर्य जैसे बड़े आग के गोले-सविता देवता का ध्यान और प्रकाश बिन्दु जैसे छोटे आकार का ध्यान भी एक प्रकार का साकार ध्यान नहीं है। अंतर मात्र इतना ही है कि उसमें मनुष्य जैसी आकृति नहीं है। ध्यान के कई तरीके हैं, जिनमें से जिन्हें जो उपयोगी हो, वह करके लाभान्वित हो सकता है। प्रखर साधना वर्ष में सारे भारत व विश्व में अखण्ड जप के साधना-आयोजन चल रहे हैं। उन सभी में ध्यान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। बिना ध्यान का जप मात्र जीभ का व्यायाम है। जप में प्राण-प्रतिष्ठा ध्यान द्वारा की जाती है। अतः ध्यान को तकनीक न मानकर भाव प्रवाह के रूप में समझते हुए करने का अभ्यास यदि इष्ट मंत्र के जप के साथ किया जाय तो वह निश्चित ही जप को प्रभावी व फलश्रुति परक बना देता है। एक प्रकार का ध्यान प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य का, सविता देवता का किया जा सकता है। स्वर्णिम प्रकाश की किरणें साधक के शरीर में प्रवेश कर रही हैं एवं वह अंदर से बाहर तक निर्मल, पवित्र, प्रकाशवान होता चला जा रहा है। यह ध्यान सर्वश्रेष्ठ है एवं इसमें सतत् सूर्य के पापनाशक तेज से आत्मसत्ता के घिरे होने के भाव चित्र बनाए जा सकते हैं, प्रार्थना की जा सकती है कि यह तेज सभी कषाय-कल्मषों को नष्टकर सद्बुद्धि का उदय कर सत्कर्म की ओर प्रेरित कर दे। यदि उदीयमान सूर्य देख पाना हर किसी के लिए अपने आवा, कमरे, पूजाकक्ष कर स्थिति के कारण संभव नहीं है, तो ऐसे चित्र का ध्यान कर भावपटल पर ऐसा चिंतन किया जा सकता है। सूर्य का छोटा संस्करण है- दीपक। जलती हुई दीपक की लौ को थोड़ी देर खुली आँखों से देखना-फिर कुछ क्षणों के लिए आँखें बंद कर उसे भ्रूमध्य नासिका के अग्र स्थान पर जहाँ दोनों नेत्र मिलते हैं-ज्योति के रूप में देखना-ज्योति अवतरण की बिंदुयोग साधना कहलाती है। इससे बहिर्त्राटक व अन्तर्त्राटक की क्रियाओं द्वारा उसे साधकर पीनियल-पिट्यूटरी एक्सिस को- आज्ञाचक्र को जगाया जा सकता है। खुली आँखों से देखने का क्रम क्रमशः कम करते हुए लौ को बार-बार देखने का अभ्यास करना चाहिए, साथ में धीरे-धीरे मानसिक जप भी चलते रहना चाहिए व खींची श्वास के साथ पवित्र वायु के-ज्योतिष्मान प्रकाश के प्रवेश का भाव एवं छोड़ी हुई निश्वास के साथ मलीनता भरे विचारों के बहिर्गमन का भाव भी साथ-साथ किया जा सकता है। यह ध्यान बुद्धि-लब्ध भाव-लब्ध स्मृति बढ़ाने से लेकर अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों के द्वार खोलता है। एक ध्यान हिमालय का किया जा सकता है। परमपूज्य गुरुदेव हिमालय को अपना संरक्षक, अभिभावक व पारस कहते थे। चार बार यात्रा कर व सतत् हिमालय का ध्यान कर उनने अपने को दिव्यदर्शी, प्रज्ञापुरुष, अवतारीसत्ता के रूप में विकसित किया। हिमालय, अध्यात्म-चेतना का ध्रुव केन्द्र है। ऋषियों की तपःस्थली हिमालय से सतत् चैतन्य धाराओं का प्रवाह आ रहा है एवं मन-मस्तिष्क को शीतल बना रहा है-तपते हुए अंतःकरण पर ठंडे छींटे लगा रहा है-यह भाव किया जा सकता है। हिमालय सदा से ही अध्यात्म-पिपासुओं-जिज्ञासु साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। फिर उसका ध्यान तो निश्चित ही अलौकिक क्षमताओं का जागरण करने की शक्ति रखता है। इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर रही मानवजाति के तपते-तनावग्रस्त तन के लिए हिमालय का ध्यान-सतत् वहीं रमण करते रहने का चिंतन एक श्रेष्ठतम चिकित्सा-उपचार हो सकता है। एक और तरीका ध्यान का है-दर्पण में अपनी आकृति देखते हुए बार-बार आत्मबोध की स्थिति में अपने अंतस् को ले जाना। तत्वमसि, अयमात्माब्रह्म, सच्चिदानंदोऽहम् का भाव लाते हुए कि हम शरीर नहीं, हाड़-माँस का पुतला नहीं हम श्रेष्ठता की प्रतिमूर्ति हैं, भाव-संवेदनाओं का पुँज हैं-हम वही हैं जो भगवान हैं। हमें वैसा ही बनना है जैसे भगवान हैं। “मुखड़ा देख ले दर्पण में” शीर्षक वाले श्री प्रदीप के गीत पर जब प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों (1973-74) में ध्यान का क्रम चल पड़ता था तो साधक फूट-फूट कर रो पड़ते थे। उन्हें बार-बार स्मरण दिलाया जाता था कि अब तक जो जीवन जिया था वह एक पशु का था। अब मानव, देवमानव का जीवन जीना है। दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता। सारे विगत कर्मों का उसमें देखते हुए साधक को ईश्वरीय स्वरूप का बोध होता है। आभास होता है कि हमें अपने आपको अब क्या बनाना है। एक ध्यान अपने इष्ट पर किया जा सकता है। ध्यान में याद रखना चाहिए कि आकृति से पीछा छूटना आसान नहीं है। ध्यान-धारणा के सहारे आत्मचिन्तन का प्रयोजन पूरा हो सके, इसके लिए इष्ट चाहे वे शिव-पार्वती हों, शिवलिंग हों, भगवान श्रीकृष्ण, विष्णु, माँ गायत्री, अम्बा, भवानी, दुर्गा, सरस्वती अथवा गणेश या हनुमान एवं काबा का ध्यान हो, चाहे ईसामसीह का पैगम्बर का हो अथवा अपने गुरु का-उन पर मन आरोपित कर ध्यान को प्रगाढ़ बनाना चाहिए। इष्टदेव के समीप-अति समीप होने, उनके साथ लिपट जाने, उच्चस्तरीय प्रेम के आदान-प्रदान की गहरी कल्पना करनी चाहिए। इसमें भगवान और जीव के बीच माता-पुत्र स्वामी-सेवक जैसा कोई भी सघन संबंध बनाया जा सकता है। इससे आत्मीयता को अधिकाधिक घनिष्ठ बनाने में मदद मिलती है। भक्त अपनी अहंता-संकीर्णता को भगवान के इष्ट के चरणों में अर्पित करता है। भावना करता है कि यह सारी सत्ता-सारा वैभव उसी दैवी शक्ति की धरोहर है। सद्गुरु अथवा भगवान -किसी पर भी ध्यान आरोपित कर वह शक्ति पायी जा सकती है, जिसकी कि कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक ध्यान जिस विपश्यना के रूप में भी प्रचलित माना गया है- खींची व छोड़ी श्वास पर ध्यान केन्द्रित करने का किया जा सकता है। हर श्वास को प्रेक्षक की तरह देखना व उस पर ध्यान केन्द्रित करना, धीरे-धीरे श्वासगति को कम कर पूरे शरीर को शिथिल करते चले जाना - यह इस ध्यान की मूल अचेतन क्रियाएँ हैं। इससे सारा शरीर सक्रिय ऊर्जा से भर जाता है। इसी की उच्चावस्था गायत्री की सोऽहम् साधना अथवा हंसयोग के रूप में बतायी गयी है, जिसमें अजपा जप भी चलता है, साथ ही खींची श्वास के साथ ‘सो’ तथा छोड़ी के साथ हम का भाव किया जाता है। ‘सो’ के साथ भगवत् चेतना का अंदर प्रवेश तथा ‘हम’ के साथ अपनी आत्मसत्ता का उसमें सराबोर होना-अपने अहं भाव को बाहर विसर्जित करना। ध्यान किसी भी पद्धति से हो, अपनी सुविधानुसार चयन कर नियमित उसे करते रहना चाहिए। अभी यहाँ ध्यान की कुछ पद्धतियाँ बतायी गयी हैं, अगले अंक में कुछ और पर प्रकाश डालकर साधकों का पथ प्रदर्शन किया जाएगा। Sadhak Anshit YouTube Channel: https://www.youtube.com/channel/UCqYj7sRAWZXrQJH5eQ_Nv9w
  • 2017-10-20T12:03:54

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बीमारियों में योगासन: किस बीमारी में कौन सा आसन करे। जैसा की हम सबको विदित है की विभिन्न बीमारियों में योगासन रोगों को ठीक करने या रोगों से होने वाले कष्टों से आराम दिलाने में सहायक होते हैं। लेकिन यह भी सच है की हर बीमारी में हर एक योगासन नहीं किया जा सकता और योगासन में हमें विभिन्न सावधानियों एवं नियमों का अनुसरण करना होता है। इसलिए आज हम हमारे इस लेख के माध्यम से विभिन्न बीमारियों में किये जाने वाले योगासनों के नामों के बारे में जानने की कोशिश करेंगे। हालांकि एक स्वस्थ्य मनुष्य हर कोई आसन एवं प्राणायाम कर सकता है लेकिन एक बीमार व्यक्ति को सिर्फ वही आसन करने चाहिए जो उस विशेष बीमारी में किये जा सकते हैं। बीमारियों में योगासन से न सिर्फ रोग जल्दी ठीक होने की संभावना होती है अपितु व्यक्ति में उस बीमारी से लड़ने के लिए एक नई उर्जा एवं ताकत का भी संचार होता है। दमा (अस्थमा), श्वास संबंधी बीमारियों में योगासन: शीर्षासन समूह, सर्वांगासन, भुजंगासन, शलभासन, धनुरासन, वीरासन, उष्ट्रासन, पर्यंकासन, पश्चिमोत्तानासन, सुप्त वीरासन, नाडी-शोधन प्राणायाम, सूर्यभेदन प्राणायाम, उड्डियान बंध, योग निद्रा। हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप): हाई ब्लड प्रेशर या उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों में योगासन की बात करें तो इनमें पद्मासन, पश्चिमोत्तानासन, सिद्धासन, पवनमुक्तासन, नाड़ी-शोधन प्राणायाम (कुंभक को छोड़कर), सीतकारी, सीतली, चन्द्रभेदन प्राणायाम, उज्जायी, योग निद्रा इत्यादि किये जा सकते हैं । इसके अलावा शांत भाव से बैठकर ईश्वर का ध्यान करें, एवं हमेशा बगैर तेल-मसाले के शाकाहारी भोजन ग्रहण करें। लो ब्लड प्रेशर (निम्न रक्तचाप): निम्न रक्तचाप जैसी बीमारी से ग्रसित व्यक्ति शशांकासन, नाडी-शोधन प्राणायाम, भस्त्रिका, कपाल-भाति, सूर्य भेदन प्राणायाम, सालंब शीर्षाशन, सर्वागासन, हलासन, कर्ण पीड़ासन, वीरासन सूर्य नमस्कार एवं शवासन जैसे योगासन किये जा सकते हैं | डायबिटीज़ मधुमेह के लिए योगासन: डायबिटीज जैसी बीमारी में शीर्षासन एवं उसके समूह, सूर्य नमस्कार, सर्वागासन, महामुद्रा, मंडूकासन मत्यस्येन्द्रासन, शवासन, नाडी-शोधन प्राणायाम इत्यादि किये जा सकते हैं | सिरदर्द जैसी बीमारियों में योगासन: सिरदर्द में मार्जारी आसन, नाड़ी-शोधन प्राणायाम/अनुलोमविलोम प्राणायाम, योग निद्रा, पद्मासन, शीर्षासन, हलासन, सर्वांगसन, पवनमुक्तासन, पश्चिमोत्तासन, वज्रासन इत्यादि किये जा सकते हैं । मिर्गी के लिए योगासन: मिर्गी की बीमारी में हलासन, महामुद्रा, पश्चिमोत्तानासन, शशांकासन, भुजंगासन और बिना कुंभक के नाडी-शोधन प्राणायाम, अंतकुंभक के साथ उज्जायी प्राणायाम, शीतली प्राणायाम, योग निद्रा इत्यादि किये जा सकते हैं इनके अलावा बीमारी से ग्रसित व्यक्ति को शाकाहारी भोजन एवं ध्यान करना चाहिए। माइग्रेन के लिए योगासन: माइग्रेन अर्थात आधाशीशी जैसी बीमारियों में योगासन के तौर पर शीर्षासन, सर्वागासन, पश्चिमोत्तानासन, पद्मासन, सिद्धासन, वीरासन, शवासन, बिना कुंभक के नाड़ी-शोधन प्राणायाम, उद्गीथ प्राणायाम, योग निद्रा इत्यादि आसनों में ध्यान लगाया जा सकता है । सीने या छाती रोग के लिए योगासन: सीने या छाती रोग के लिए पश्चिमोत्तानासन, अर्ध मत्स्येन्द्रासन, बकासन, बछद्रकोणासन, चक्रासन, कपोतासन, नटराजासन, पीछे झुककर किए जाने वाले आसन, उज्जायी तथा नाड़ी-शोधन प्राणायाम, योग निद्रा, सूर्य नमस्कार, शीर्षासन, सर्वांगसन, भुजंगासन, धनुरासन, पदमासन, आकर्ण धनुरासन इत्यादि किये जा सकते हैं। कमर दर्द के लिए योगासन: कमर दर्द नामक इस रोग में वे सभी आसन जिनकी क्रिया खड़े होकर पीछे की तरफ़ की जाती है किये जा सकते हैं इनके अलावा सुप्त वज्रासन, धनुरासन, भुजंगासन, अर्ध मत्स्येन्द्रासन पर्वतासन, सर्वागासन, शीर्षासन, चक्रासन, नाड़ी-शोधन प्राणायाम, कपाल-भाति इत्यादि किये जा सकते हैं । यादाश्त बढ़ाने के लिए योगासन: स्मरण शक्ति के विकास अर्थात यादाश्त बढ़ाने के लिए शीर्षासन एवं उसका समूह, सर्वागासन, पश्चिमोत्तानासन, उत्तानासन, योग– मुद्रासन, पादहस्तासन, पद्मासन में ध्यान या सिद्धासन में ध्यान, सामान्य त्राटक, शवासन, नाड़ी-शोधन प्राणायाम, सूर्य भेदन एवं भस्त्रिका प्राणायाम, योगनिद्रा इत्यादि किये जा सकते हैं। पेट के दर्द या पेट के लिए योगासन: स्टोमक अर्थात पेट दर्द जैसी बीमारियों में योगासन के रूप में शीर्षासन, सर्वांगसन, हलासन, उत्तानासन, वीरासन, सुप्त वीरासन वज्रासन एवं नौकासन किये जा सकते हैं इसके अलावा सरकी नाभि को ठीक करने वाले आसन भी किये जा सकते हैं | किडनी अर्थात गुर्दा रोग के लिए योगासन: इस रोग में सूर्य नमस्कार, सर्वागासन, शीर्षासन एवं उसका समूह, हलासन, पश्चिमोत्तानासन, हनुमानासन, कपोतासन, उष्ट्रासन, शलभासन, धनुरासन, अर्ध नौकासन, मत्स्येन्द्रासन, भुजंगासन इत्यादि किये जा सकते हैं । नपुंसकता दूर करने वाले आसन: योगासन के तौर पर शीर्षासन एवं उसके समूह, सर्वांगासन, उत्तानासन, पश्मिोत्तानासन, महामुद्रासन, अर्ध मत्स्येन्द्रासन, हनुमानासन, कपाल–भाति, अनुलोम-विलोम, नाड़ी-शोधन प्राणायाम अंतकुंभक के साथ, उड़ियान बंध, वज्रोली मुद्रा एवं विपरीतकरणी मुद्रा इत्यादि किये जा सकते हैं | आलस्य को भागने वाले योगासन: शीर्षासन, सर्वागासन, पश्चिमोत्तानासन, उत्तानासन, बिना कुंभक के नाड़ी-शोधन प्राणायामबी इत्यादि ऐसे आसन एवं प्राणायाम हैं जो आलस्य को दूर करने में सहायक हैं। दस्त अर्थात पेचिश के लिए योगासन: दस्त एवं पेचिश जैसी बीमारियों में योगासन के तौर शीर्षासन और उसके समूह, सवाँगासन, जानुशीर्षासन, बिना कुंभक के नाड़ी-शोधन प्राणायाम इत्यादि किये जा सकते हैं । आँत के अल्सर के लिए योगासन: आंत के अल्सर में शीर्षासन एवं उससे सम्बंधित समूह, सर्वागासन, पश्चिमोत्तानासन, योग निद्रा, अर्ध मत्स्येन्द्रासन, उज्जायी एवं नाड़ी-शोधन प्राणायाम, अंतकुंभक के साथ उड़ियान बंध इत्यादि योगासन किये जा सकते हैं। पेट के अल्सर के लिए योगासन: पेट के अल्सर के लिए वज्रासन, मयूरासन, नौकासन, पादहस्तासन, उत्तानासन, पादांगुष्ठासन, शलभासन इत्यादि आसन किये जा सकते हैं। हार्निया के लिए योगासन: हर्निया नामक बीमारी को ठीक करने में शीर्षासन एवं उसका समूह, सवाँगासन, आकर्ण धनुरासन इत्यादि योगासन सहायक होते हैं । अण्डकोष वृद्धि के लिए योगासन: इसमें शीर्षासन एवं उनका समूह, सर्वागासन, हनुमानासन, समकोणासन, वज्रासन, गरुड़ासन, पश्चिमोत्तासन, बढ़ कोणासन, योग मुद्रासन, ब्रह्मचर्यासन, वात्यनासन इत्यादि किये जा सकते हैं । हृदय के दर्द के लिए योगासन: ह्रदय दर्द एवं ह्रदय विकार जैसी बीमारियों में योगासन के तौर पर शवासन, उज्जायी प्राणायाम बिना कुंभक के, योग निद्रा, सुखासन में ध्यान या शवासन में ध्यान, एवं नाड़ी-शोधन प्राणायाम इत्यादि किये जा सकते हैं। कब्ज, गैस, अजीर्ण इत्यादि के लिए योगासन: कब्ज, गैस बनना, अजीर्ण, मल निष्कासन में परेशानी, अम्लता एवं वात रोग, दुर्गधित श्वास इत्यादि बीमारियों में योगासन के रूप में शीर्षासन व उसका समूह, सर्वागासन, नौकासन, पश्चिमोत्तानासन, मत्स्येन्द्रासन, धनुरासन, भुजंगासन, मयूरासन, योग मुद्रासन, उन्न्तासन, पदमासन, वज्रासन, पवनमुक्तासन व इससे संबंधित आसन, त्रिकोणासन, महामुद्रा, शलभासन, मत्स्यासन, अर्ध चंद्रासन, शशांकासन, पादांगुष्ठासन एवं शंखप्रक्षालन वाले आसन एवं खड़े रहकर होने वाले सभी आसन किये जा सकते हैं। जोड़ो के दर्द, गठिया के लिए योगासन: जोड़ो के दर्द, गठिया, संधिवात इत्यादि जैसी बीमारियों में योगासन के तौर पर शीर्षासन तथा उसका समूह, सर्वागासन, पद्मासन, सिद्धासन, वीरासन, पर्यकासन, गौमुखासन, उत्तानासन एवं पश्चिमोत्तानासन, पवनमुक्तासन समूह की क्रियाएँ की जा सकती हैं। पायरिया एवं चेहरे की ताजगी के लिए योगासन: दाँत, मसूढ़े, पायरिया, गंजापन, चेहरे की ताज़गी, झुर्रिया व सामान्य आँख की बीमारियों के लिए शीर्षासन एवं उसका समूह, सवाँगासन, हलासन, विपरीतकरणी मुद्रा, पश्चिमोत्तानासन, शलभासन, वज्रासन, भुजंगासन, सूर्य नमस्कार, सिंहासन, दृष्टि वर्धक यौगिक अभ्यासावली एवं सिर के बल किए जाने वाले सभी आसन किये जा सकते हैं। मोटापा दूर करने के लिए योगासन: मोटापा कम करने या दूर करने के लिए विशेष तौर पर उर्जादायक खास आसन एवं क्रियाएँ, सूर्य नमस्कार, शीर्षासन तथा उसका समूह, सर्वागासन, हलासन, पवनमुक्तासन समूह की क्रियाएँ विपरीतकरणी मुद्रा एवं वे सभी आसन जो पेट सम्बंधित रोग व अजीर्णता के लिए हैं किये जा सकते हैं | मोटापा कम करने के लिए आहार का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। फेफड़े के लिए योगासन: फेफड़े के लिए शीर्षासन तथा उसका समूह, सर्वागासन, पद्मासन, सूर्य नमस्कार, लोलासन, वीरासन, खड़े होकर किए जाने वाले आसन, चक्रासन, धनुरासन, अंतकुंभक के साथ सभी प्राणायाम किये जा सकते हैं। कमर दर्द एवं सर्वाइकल पेन के लिए योगासन: कमर दर्द, सर्वाइकल पेन, स्लिप डिस्क, साइटिका, स्पाँन्डिलाइटिस इत्यादि के लिए खड़े रहने की क्रिया के और पीछे झुकने वाले आसन जैसे – भुजंगासन, शलभासन, धनुरासन, उत्तानपादासन, वज्रासन, सुप्त वज्रासन, गौमुखासन, ताडासन, उत्कटासन, मकरासन इत्यादि किये जा सकते हैं | हाइट अर्थात लम्बाई बढ़ाने के लिए योगासन: शरीर की लंबाई बढ़ाने के लिए ताड़ासन, सूर्य नमस्कार, धनुरासन, हलासन, सर्वागासन एवं पश्चिमोत्तानासन जैसे योगासन किये जा सकते हैं। लकवा एवं पोलियो बीमारियों में योगासन: यद्यपि लकवा एवं पोलियो जैसी बीमारियों में बेहतर यही होता है की रोगी की स्थिति का पता लगाकर किसी डॉक्टर से सलाह लेकर किसी प्रशिक्षित योग गुरु की देखरेख में योग क्रियाएं करवाई जाएँ क्योंकि पोलियों नामक यह बीमारी सामान्य तौर पर जन्म से ही होती है जबकि लकवा कभी हो हो सकता है बाल्यावस्था या उसके बाद इसलिए बीमारी कितनी पुराणी है उस आधार पर आयुर्वेदिक दवाओं के साथ योग क्रियाएं करना इन बीमारियों में फायदेमंद हो सकता है | इन बीमारियों में शलभासन, धनुरासन, मकरासन, भुजंगासन, पदमासन, सिधासन, कन्धरासन, हलासन, सर्वागासन, शवासन, उज्जायी तथा नाडी-शोधन प्राणायाम लाभकारी हो सकते हैं । खून की कमी के लिए योगासन: खून की कमी या रक्त अल्पता में शीर्षासन एवं उसका समूह, सर्वागासन, पश्चिमोत्तानासन, सूर्य नमस्कार, उज्जायी प्राणायाम, नाडीशोधन प्राणायाम, कपालभाति प्राणायाम इत्यादि फायदेमंद हो सकते हैं । गुदा सम्बन्धी रोगों के लिए योगासन गुदा से सम्बन्धित रोग जैसे बवासीर, भगन्दर, फिशर इत्यादि बीमारियों में योगासन के तौर पर शीर्षासन एवं उसका समूह, सर्वांगसन, हलासन, विपरितिकरण मुद्रा, मत्स्यासन, सिंहासन, शलभासन, धनुरासन, बिना कुंभक के उज्जायी, तथा नाड़ी-शोधन प्राणायाम इत्यादि किये जा सकते हैं । खाँसी के लिए योगासन: खांसी के लिए शीर्षासन एवं उसका समूह, सवांगासन, उत्तानासन, पश्चिमोत्तानासन, अर्ध मत्स्येन्द्रासन इत्यादि किये जा सकते हैं और यदि खांसी जुकाम के साथ है तो सूर्यनमस्कार भी किया जा सकता है। अनिद्रा, चिंता, निराशा, दूर करने के लिए योगासन: अनिद्रा, चिंता, उन्माद, निराशा एवं मानसिक दुर्बलता को दूर करने सहायक आसन सूर्य नमस्कार एवं उसका समूह, सर्वांगसन, कुर्मासन, पश्चिमोत्तासन, शशांकासन, योगमुद्रा, उत्तानासन बिना कुंभक के भस्त्रिका, नाड़ी-शोधन तथा सूर्य भेदन प्राणायाम साथ में भ्रामरी, मूच्छां, शीतली एवं सीतकारी प्राणायाम एवं योगनिद्रा किये जा सकते हैं | मासिक धर्म में अनियमितता के लिए योगासन: मासिक धरम में अनियमितता एवं अंडाशय से सम्बंधित बीमारियों में योगासन के तौर पर सर्वागासन, भुजंगासन, वीरासन, वज्रासन, शशांकासन, मार्जरी आसन, योग– निद्रा, नाड़ी-शोधन प्राणायाम, मूलबंध, उड्डीयान बंध, विपरीतकरणी, वज्रोली मुद्रा, योनिमुद्रा एवं योग मुद्रासन किये जा सकते हैं । यदि मासिक स्राव अधिक हो रहा हो तो उसके लिए बद्ध कोणासन, जानुशीर्षासन, पश्चिमोत्तानासन, उन्न्तासन एवं पवनमुक्तासन समूह की क्रियाएँ की जा सकती हैं | मूत्र सम्बन्धी रोगों के लिए योगासन: पौरुष ग्रन्थि, पेशाब-विकृति जैसी बीमारियों में योगासन के तौर पर शीर्षासन तथा उसका समूह, सर्वागासन, हलासन, शलभासन, धनुरासन, उत्तानासन, नौकासन, सुप्तवज्रासन, बद्ध कोणासन, उड़ियान, नाड़ी-शोधन इत्यादि किये जा सकते हैं । स्वप्नदोष के लिए योगासन: स्वप्नदोष के लिए शीर्षासन से सम्बंधित आसन समूह, सवाँगासन, पश्चिमोत्तानासन, बद्ध कोणासन, मूलबंध, वज्रोली मुद्रा, योनि मुद्रा, नाडी-शोधन प्राणायाम किये जा सकते हैं | इसके अलावा स्वप्नदोष से ग्रसित व्यक्ति को अच्छी सोच बनाये रखना नितांत आवश्यक है और रात्रि को शीतल जल से हाथ पैर धोकर सोया जा सकता है । गर्भावस्था में किये जाने वाले योगासन: गर्भावस्था के दौरान बेहद हलके व्यायाम पवनमुक्तासन सम्बन्धी आसन एवं बिना कुम्भक के प्राणायाम, उचित प्रशिक्षक की देखरेख में किये जा सकते हैं | बाँझपन के लिए योग: बांझपन में सर्वागासन, हलासन, पश्चिमोत्तानासन, पद्मासन या सिद्धासन, चक्रासन, गरुड़ासन, वातायनासन, सभी मुद्राएँ जैसे वज़ोली मुद्रा, योनि मुद्रा, नाड़ी-शोधन प्राणायाम, कपालभाति प्राणायाम इत्यादि लाभकारी होते हैं । गले की तकलीफ के लिए योगासन : मत्स्यासन, सिंहासन, सुप्त वज्रासन और सर्वांगासन। पथरी के लिए योग: मत्स्येंद्रासन, मत्स्यासन, तोलांगुलासन और वज्रासन। योगासन करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए वैसे तो यह जानकारी हम अपने पुराने लेख में दे चुके है फिर भी यहाँ संक्षेप में जान लेते है | योग कहां और कैसे करें? •खुली एवं ताजी हवा में योगासन करना सबसे अच्छा माना जाता है। अगर ऐसा न हो, तो किसी भी खाली जगह पर आसन किए जा सकते हैं। •जहां योगासन करें, वहां का माहौल शांत होना चाहिए। वहां शोर-शराबा न हो। उस स्थान पर मन को शांत करने वाला संगीत भी हल्की आवाज में चलाया जा सकता हैं। •सीधे फर्श पर बैठकर योगासन न करें। योगा मैट, दरी या कालीन जमीन पर बिछाकर योगासन कर सकते हैं। •योगासन करते समय सूती के या थोड़े ढीले कपड़े पहनना बेहतर रहता है। टी-शर्ट या ट्रेक पैंट पहनकर भी योगासन कर सकते हैं। •आसन धीरे या फिर तेजी से-दोनों तरह से करना फायदेमंद होता है। जल्दी करें तो वह दिल के लिए अच्छा रहता है और धीरे करेंगे तो वह मांसपेशियों के लिए बेहतर रहता है तथा इससे शरीर को भी काफी मजबूती मिलती है। •ध्यान आंखें बंद करके करें। ध्यान शरीर के उस हिस्से पर लगाएं, जहां आसन का असर हो रहा है, जहां दबाव पड़ रहा है। पूरे भाव से करेंगे, तो उसका अच्छा प्रभाव आपके शरीर पर पड़ेगा। •योग में सांस लेने एवं छोड़ने की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसका सीधा-सा मतलब यही होता है कि जब शरीर फैलाएं या पीछे की तरफ जाएं, सांस लें और जब भी शरीर सिकुड़े या फिर आगे की तरफ झुकें तो सांस छोड़ते हुए ही झुकें। योग आसन कब करना चाहिए ? •आसन सुबह के समय करना ही सबसे अच्छा होता है। सुबह आपके पास समय नहीं है, तो शाम या रात को खाना खाने से आधा घंटा पहले भी कर सकते हैं। यह ध्यान रखें कि आपका पेट न भरा हो। भोजन करने के 3-4 घंटे बाद और हल्का नाश्ता लेने के 1 घंटे बाद योगासन कर सकते हैं। चाय-छाछ आदि पीने के आधे घंटे बाद और पानी पीने के 10-15 मिनट बाद आसन करना बेहतर रहता है। ये सावधानियां भी बरतें: •योग में विधि, समय, निरंतरता, एकाग्रता और सावधानी जरूरी है। •कभी भी आसन झटके से न करें और उतना ही करें, जितना आसानी से कर पाएं। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाएं। •कमर दर्द हो तो आगे न झुकें, पीछे झुक सकते हैं। •अगर हार्निया हो तो पीछे न झुकें। •दिल की बीमारी हो या उच्च रक्तचाप हो तो तेजी के साथ योगासन नहीं करना चाहिए। शरीर कमजोर है, तो फिर योगासन आराम से करें। 3 साल से कम उम्र के बच्चे योगासन न करें। 3 से 7 साल तक के बच्चे हल्के योगासन ही करें। •7 साल से ज्यादा उम्र के बच्चे हर तरह के योगासन कर सकते हैं। •गर्भावस्था के दौरान मुश्किल आसन और कपालभाति बिलकुल भी न करें। महिलाएं मासिक धर्म खत्म होने के बाद, प्रसवोपरांत 3 महीने बाद और सिजेरियन ऑपरेशन के 6 महीने बाद ही योगासन कर सकती हैं। ये गलतियां बिलकुल न करें: •किसी भी आसन के फाइनल पॉश्चर (अंतिम बिंदु) तक पहुंचने की जल्दबाजी बिल्कुल भी न करें, अगर आपका तरीका थोड़ा-सा भी गलत हो गया, तो फिर अंतिम बिंदु तक पहुंचने का कोई भी लाभ नहीं मिलने वाला है। मसलन, हलासन में पैरों को जमीन पर लगाने के लिए घुटने मोड़ लें, तो बेकार है। जहां तक आपके पैर जाएं, वहीं रुकें, लेकिन घुटने सीधे रखें। •योगासन करते हैं, तो फिर आपको खाने पर नियंत्रण करना भी जरूरी होता है। अगर आप अत्यधिक कैलोरी और अत्यधिक वसा युक्त वाला खाद्य-पदार्थ या फिर तेज मिर्च-मसाले वाला खाना खाते रहेंगे तो फिर योग का कोई खास असर नहीं होने वाला है। •जब भी किसी बीमारी से छुटकारा पाने के लिए योगासन करें, तो विशेषज्ञ से पूछकर ही करें। योग का असर तुरंत नहीं होता है। ऐसे में दवाएं भी तुरंत बंद न करें। जब बेहतर लगे, जांच भी कराते रहें, फिर उसके बाद ही डॉक्टर की सलाह से दवा बंद करें। •योगासन का असर होने में थोड़ा वक्त लगता है। फौरन नतीजों की उम्मीद नहीं करें। कम-से-कम खुद को 6 माह का समय दें। फिर देखें-असर हुआ या नहीं। •लोग बीमारी का इलाज भी योगासन से करते हैं और फिर योगासन छोड़ देते हैं। यह समझ लें-योगासन बीमारियों का इलाज करने के लिए नहीं है इसे लगातार करते रहें, ताकि भविष्य में आपको बीमारियां न हों। Sadhak Anshit Yoga Teacher © 2019 By Sadhak Anshit
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