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योग परम्परा और शास्त्रों का विस्तृत इतिहास रहा है। हालाँकि इसका इतिहास दफन हो गया है अफगानिस्तान और हिमालय की गुफाओं में और तमिलनाडु तथा असम सहित बर्मा के जंगलों की कंदराओं में। जिस तरह राम के निशान इस भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे पड़े है उसी तरह योगियों और तपस्वियों के निशान जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में आज भी देखे जा सकते है। बस जरूरत है भारत के उस स्वर्णिम इतिहास को खोज निकालने की जिस पर हमें गर्व है।माना जाता है कि योग का जन्म भारत में ही हुआ मगर दुखद यह रहा की आधुनिक कहे वाले समय में अपनी दौड़ती-भागती जिंदगी से लोगों ने योग को अपनी दिनचर्या से हटा लिया। जिसका असर लोगों के स्वाथ्य पर हुआ। मगर आज भारत में ही नहीं विश्व भर में योग का बोलबाला है और निसंदेह उसका श्रेय भारत के ही योग गुरूओं को जाता है जिन्होंने योग को फिर से पुनर्जीवित किया। श्री तिरुमलाई कृष्णामचार्य, बीकेएस अयंगर, रामदेव कुछ ऐसे ही नाम है जिन्होंने योग को फिर से उच्चाईयों पर पहुँचाया है। योग साधना के आठ अंग हैं, जिनमें प्राणायाम चौथा सोपान है। अब तक हमने यम, नियम तथा योगासन के विषय में चर्चा की है, जो हमारे शरीर को ठीक रखने के लिए बहुत आवश्यक है।प्राणायाम के बाद प्रत्याहार, ध्यान, धारणा तथा समाधि मानसिक साधन हैं। प्राणायाम दोनों प्रकार की साधनाओं के बीच का साधन है, अर्थात्‌ यह शारीरिक भी है और मानसिक भी। प्राणायाम से शरीर और मन दोनों स्वस्थ एवं पवित्र हो जाते हैं तथा मन का निग्रह होता है।(1) योगासनों का सबसे बड़ा गुण यह हैं कि वे सहज साध्य और सर्वसुलभ हैं। योगासन ऐसी व्यायाम पद्धति है जिसमें न तो कुछ विशेष व्यय होता है और न इतनी साधन-सामग्री की आवश्यकता होती है।(2) योगासन अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबल-निर्बल सभी स्त्री-पुरुष कर सकते हैं।(3) आसनों में जहां मांसपेशियों को तानने, सिकोड़ने और ऐंठने वाली क्रियायें करनी पड़ती हैं, वहीं दूसरी ओर साथ-साथ तनाव-खिंचाव दूर करनेवाली क्रियायें भी होती रहती हैं, जिससे शरीर की थकान मिट जाती है और आसनों से व्यय शक्ति वापिस मिल जाती है। शरीर और मन को तरोताजा करने, उनकी खोई हुई शक्ति की पूर्ति कर देने और आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से भी योगासनों का अपना अलग महत्त्व है।(4) योगासनों से भीतरी ग्रंथियां अपना काम अच्छी तरह कर सकती हैं और युवावस्था बनाए रखने एवं वीर्य रक्षा में सहायक होती है।(5) योगासनों द्वारा पेट की भली-भांति सुचारु रूप से सफाई होती है और पाचन अंग पुष्ट होते हैं। पाचन-संस्थान में गड़बड़ियां उत्पन्न नहीं होतीं।(6) योगासन मेरुदण्ड-रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और व्यय हुई नाड़ी शक्ति की पूर्ति करते हैं।(7) योगासन पेशियों को शक्ति प्रदान करते हैं। इससे मोटापा घटता है और दुर्बल-पतला व्यक्ति तंदरुस्त होता है।(8) योगासन स्त्रियों की शरीर रचना के लिए विशेष अनुकूल हैं। वे उनमें सुन्दरता, सम्यक-विकास, सुघड़ता और गति, सौन्दर्य आदि के गुण उत्पन्न करते हैं।(9) योगासनों से बुद्धि की वृद्धि होती है और धारणा शक्ति को नई स्फूर्ति एवं ताजगी मिलती है। ऊपर उठने वाली प्रवृत्तियां जागृत होती हैं और आत्मा-सुधार के प्रयत्न बढ़ जाते हैं।(10) योगासन स्त्रियों और पुरुषों को संयमी एवं आहार-विहार में मध्यम मार्ग का अनुकरण करने वाला बनाते हैं, अत: मन और शरीर को स्थाई तथा सम्पूर्ण स्वास्थ्य, मिलता है।(11) योगासन श्वास- क्रिया का नियमन करते हैं, हृदय और फेफड़ों को बल देते हैं, रक्त को शुद्ध करते हैं और मन में स्थिरता पैदा कर संकल्प शक्ति को बढ़ाते हैं।(12) योगासन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वरदान स्वरूप हैं क्योंकि इनमें शरीर के समस्त भागों पर प्रभाव पड़ता है और वह अपने कार्य सुचारु रूप से करते हैं।(13) आसन रोग विकारों को नष्ट करते हैं, रोगों से रक्षा करते हैं, शरीर को निरोग, स्वस्थ एवं बलिष्ठ बनाए रखते हैं।(14) आसनों से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। आसनों का निरन्तर अभ्यास करने वाले को चश्में की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।(15) योगासन से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता है, जिससे शरीर पुष्ट, स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है। आसन शरीर के पांच मुख्यांगों, स्नायु तंत्र, रक्ताभिगमन तंत्र, श्वासोच्छवास तंत्र की क्रियाओं का व्यवस्थित रूप से संचालन करते हैं जिससे शरीर पूर्णत: स्वस्थ बना रहता है और कोई रोग नहीं होने पाता। शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक सभी क्षेत्रों के विकास में आसनों का अधिकार है। अन्य व्यायाम पद्धतियां केवल वाह्य शरीर को ही प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं, जब कि योगसन मानव का चहुँमुखी विकास करते हैं।best yoga in india, best yoga classes in india
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चेहरे की चमक - दमक और सुन्दरता बढ़ाने के लिए करें - फेसिअल योग (Facial Yoga)  योग कई तरह से शरीर और मस्तिष्क को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है। सेहतमंद बनाए रखने के साथ ही योग के जरिए आप अपने सौंदर्य और खूबसूरती को लंबे समय तक बनाए रख सकते है। मै योग गुरु नरेन्द्र सिंह आपको बताने जा रहा हूँ, ऐसे ही आसान आसन और क्रियाएँ जो अपके शरीर को जवां बनाए रखने में मदद करेंगे. साथ ही आपके चेहरे के निखार को बढ़ा देंगे।शेर की तरह चेहरा (सिंहासन):-धीरे-धीरे सांस लें और उसे थोड़ी देर तक रोककर रखें। फिर आप अपने जीभ को बाहर निकाले. अपनी आखों को पूरी तरह से जितना हो सकें खोलें. इस अवस्था में बैठे रहे और जितना हो सकें अपनी जीभ को मुंह से बाहर निकालें. यह आपके शरीर में रक्त संचार बढ़ाता है. साथ ही इससे मांसपेशियों का तनाव भी खत्म होता है।मछली आसन (मत्सय आसन):-इस आसन में शरीर का आकार मछली जैसा बनता है, इसलिए यह मत्स्यासन कहलाता है. इस आसन को करने के लिए आप लंबी सांस लें. इसे थोड़ी देर तक रोक कर रखे. पहले पद्मासन लगाकर बैठ जाएं. फिर पद्मासन की स्थिति में ही सावधानीपूर्वक पीछे की ओर चित होकर लेट जाएं. ध्यान रहे कि लेटते समय दोनों घुटने जमीन से ही सटे रहें. फिर दोनों हाथों की सहायता से शिखास्थान को भूमि पर टिकाएं. उसके बाद बाएं पैर के अंगूठे और दोनों कोहनियों को भूमि से लगाए रखें. एक मिनट से प्रारम्भ करके पांच मिनट तक अभ्यास बढ़ाएं. फिर हाथ खोलकर हाथों की सहायता से सिर को सीधा कर कमर, पीठ को भूमि से लगाएं. फिर  हाथों की सहायता से उठकर बैठ जाएँ. आसन करते वक्त श्वास-प्रश्वास की गति सामान्य बनाए रखें।.लाभ - इससे आंखों की रोशनी बढ़ती है. गला साफ रहता है तथा छाती और पेट के रोग दूर होते हैं. रक्ताभिसरण की गति बढ़ती है, जिससे चर्म रोग नहीं होता. दमे के रोगियों को इससे लाभ मिलता है. पेट की चर्बी घटती है. खांसी दूर होती है.नेत्रशक्ति विकासक क्रिया-गहरी सांस लें और अपनी गर्दन को सीधा रखें. अपनी आखों को बायी तरफ घुमाएं. इस अवस्था में कुछ देर तक रहने की कोशिश करें. कुछ सेकेंड के बाद अपनी आंखों को दायी तरफ घुमाएं. इस प्रक्रियो को दोहराते रहे. आंखों की पुतलियों उस अमुक दिशा में पूरी तरह घूमनी चाहिए. इस बात का ध्यान रखें।कपोल शक्ति विकासक क्रिया-सुखासन में बैठकर दोनों हाथों की उंगलियों के टिप्स मिला ले। अब अंगूठो से दोनों नासिकारन्द्रो को बंद कर दे मुह को गोल बनाकर हवा को अंदर भरें। गाल फुलाकर रखें साँस को यथाशक्ति रोके। फिर अंगूठे हटाते हुए नाक से साँस बाहर छोड़ दे। 3 बार अभ्यास करे। हथेलियों से योग:-अपनी हथेलियों को रगड़कर उन्हें गर्मी प्रदान करें. फिर आंखों को बंद करें और उन्हें अपनी हथिलियों से ढक लें. फिर अपनी नाक के दोनों नथुनों से सांस लें. जितनी देर तक रोक सकते हो रोकें. इससे आपकी आखों को आराम मिलेगा. आप खुद को रिलैक्स महसूस करेंगे. आपकी मांसपेशियों का तनाव दूर होगा. इस बात का ध्यान रखें कि गर्म हथेलियों से चेहरे को पूरी तरह ढकें. मुँह में हवा भर ले अंदर रोक ले फिर जबड़ों को ऊपर नीचे चलाएं जैसे खाना खाते है। अपने सामर्थ्य के अनुसार 3 बार करें।याददास्त के लिए-जीभ को पूरी बाहर निकाले फिर जीभ को देखते हुए दाए और बांए चलाए। 10 - 10 बार। याददास्त बढ़ेगी।सावधानी - ये सभी क्रियाएं अपने योग शिक्षक से पूछ कर ही करें।
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Sadhak Anshit was born on August 15, 1985 in Kanpur city, this is a Yogi, a spiritual guru and a visionary. They are also called 'seekers'. Her mother is Asha and father Arun ji and her wife's name is Neha ji. He is the eldest of his three brothers and he is the founder of the Profit and Human Welfare Association 'Service', a non-profit human services organization. The service organization teaches yoga and meditation method programs in many states of India, including Uttar Pradesh as well as many social and community development schemes.((Sequence))1- Early life2- spiritual experiences3 -service organizations4- Shiva Yoga CenterEarly life Sadak Anshit was born on August 15, 1985 in Kanpur city of Uttar Pradesh state. His father was also a meditator. Since childhood, seekers were unselfish nature lovers and they had very close relationship with nature. From time to time, in spite of seeing their natural breath, they used to go into deep meditation, from which they could understand other subjects and things better and better, clearly and better. He had a good understanding of good and bad from childhood. In the teens, he was elected from Kanpur University by winning the election of student wing and by staying in the middle of the youth, he guided him from time to time, as a good guide and guide. And by staying in the middle of youth, he gave a slogan "Nash Mukt Yuva" To carry out extensive campaigns and work and to stop the youth from going ahead, they will be periodically Keep doing the work At the age of 24, he met Yogguru Rishi Ji, after which he started the hard work of yoga and meditation, and gradually he experienced many spiritual experiences and his spiritual journey took a new dimension, Founded as a seeker and spiritual master. He got a Masters degree from M.P. from the University of Kanpur, along with a degree of physical education as well as a degree of physical education. And he practiced strictly by adopting the ancient meditation method, Vipassana and in this sadhana he examined himself, as a result, he could give his life a new direction.Spiritual Experience At the age of 25, in a very strange way, he had a deep self-realization, which changed the direction of his life. In an ashram of Dehradun, he was sitting in meditation meditation, while his mind reached the state of thoughtlessness and suddenly, at the same time, he was experienced beyond body. He felt that he was not in his body and he started experiencing another body, gradually, with time, he went on doing his meditation deeper, which made him many other divine temporal and supernatural experiences. Then he resolved to give up these experiences and these meditation methods to every single person of the whole universe, who have been wandering from his true path and engaged in other topics, he says that the sensation of the bliss of the ecstasy Every person should be a person who is suffering from work, anger, greed, attachment, delusion and laziness in the physical world. Organization Work Student and Youth Welfare Association (Services) created the institution even though they did this by keeping the youth in their minds, but along with the time, they were working with the task of awakening this young class suffering from drug de-addiction in this institution, along with poor children. He also went to the slum huts and started a single school program and also helped many promising poor children. By joining yoga with the institution, he has undertaken many programs of yoga and meditation method in many parts of this country and have been doing it steadily and also connecting Manjan-Manas with his ancient civilization and working towards paving the way for truth and religion. Have been doing from time to time and also in the present time.Shiva Yoga Center The initiation of Shiva Yoga center was done with only this far-reaching thinking that every person coming to this yoga center can know about his inner strength and through the yoga and meditation practice, he is able to find a way from the middle of that irresponsible path. May be the path which was ever difficult and impossible for him. This powerful place designed for the journey of internal development is devoted to reaching the four main paths of yoga - knowledge, karma, action and devotion to the people.
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साधक अंशित के आध्यात्मिक अनुभवों पर आधारित लेख:ध्यान क्यों व कैसे किया जाय??मानसिक असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए, चित्तवृत्तियों के बिखराव को एकीकरण के द्वारा एकाग्रता की स्थिति में लाने के लिए ध्यान से श्रेष्ठ कोई उपाय नहीं। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ सारे समाज में साधनों को बटोरने की बेवजह बेतहाशा दौड़-सी चल रही है, प्रायः सभी का मन असंतुलित, बिखरा हुआ-तनावग्रस्त देखा जाता है। कई बार मन क्रोध, शोक, प्रतिशोध, विक्षोभ, कामुकता जैसे उद्वेगों में फँस जाता है। उस स्थिति में किसी का हित नहीं सधता। अपना या पराया किसी का भी कुछ अनर्थ हो सकता है। उद्विग्नताओं के कारण आज समाज में सनकी-विक्षिप्त स्तर के व्यक्ति बढ़ते जा रहे हैं। सही निर्णय करना तो दूर वे कब आत्मघाती कदम उठा लेंगे, समझ में नहीं आता। इन विक्षोभों से मन-मस्तिष्क को उबारने का एक ही उपाय है- मन को विचारों के संयम का-संतुलित स्थिति बनाए रखने का अभ्यस्त बनाने पर जोर दिया जाय। इसी का नाम ‘ध्यान साधना’ है। मन को अमुक चिन्तन प्रवाह से हटाकर अमुक दिशा में नियोजित करने की प्रक्रिया ही ध्यान कहलाती है। शुभारंभ के रूप में भटकाव के स्वेच्छाचार से मन को हटाकर एक नियत-निर्धारित दिशा में लगाने के प्रयोगों का अभ्यास किया जाय तो शीघ्र सफलता मिलती है।कहा गया है कि जो अपने को वश में कर लेता है। गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता (अध्याय 2)। बार-बार जब वे इन्द्रियों को वश में रखने की बात कहते हैं तो उसमें सबसे प्रधान है मन, जिसके इशारे पर शेष सारी इन्द्रियाँ नाचती हैं। आत्मनियंत्रण से प्रज्ञा के प्रतिष्ठित होने का पथ प्रशस्त होता है व उसके लिए बेसिर-पैर की दौड़ लगाने वाला अनगढ़ विचारों को बार-बार घसीटकर श्रेष्ठ-चिन्तन के प्रवाह में लाने का प्रयास-पुरुषार्थ करना पड़ता है। आसान नहीं है यह, पर असंभव भी नहीं। यदि यह किया जा सका तो आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से लाभ मिलते हैं। जहाँ इस वैचारिक तन्मयता की फलश्रुति आध्यात्मिक जगत में प्रसुप्त शक्तियों के जागरण से लेकर ईश्वरप्राप्ति-रसौ वै सः की आनन्दानुभूति के रूप में प्राप्त होती है, वहाँ भौतिक क्षेत्र में अभीष्ट प्रयोजनों में पूरी तन्मयता-तत्परता नियोजित होने से कार्य का स्तर ऊँचा उठता है, सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है और बढ़ी-बढ़ी उपलब्धियाँ मिलती हैं।वस्तुतः विचारों का, श्रेष्ठ सकारात्मक विचार-प्रवाहों का व्यक्तित्व को कराया गया स्नान ही ध्यान है। सूक्ष्म व कारण सत्ता पर नित्य जमने वाले कषाय-कल्मषों की धुलाई इसी ध्यान रूपी साबुन से हो सकती है। ध्यान है। ध्यानयोग का मूलभूत लक्ष्य है- साधक को अपनी मूलभूत स्थिति के बारे में, अपने आपे के बारे में बोध कराना। उसकी उस स्मृति को वापस लौटाना, जिससे कि वह भटका हुआ देवता अपने मूलस्वरूप को जान सके। आज का हर व्यक्ति आत्मविस्मृत मनःरोगी की स्थिति में जी रहा है। ऐसी स्थिति में व्यथित-ग्रसित लोग स्वयं तो घाटे में रहते ही हैं, अपने परिचितों, संबंधियों को भी दुखी करते रहते हैं। विस्मरण का निवारण एवं आत्मबोध की भूमिका में पुनः जागरण, यही है ध्यानयोग का लक्ष्य।किसी संत ने कहा है कि ध्यान किया नहीं जाता है, हो जाता है। सही भी है, जब ध्यान के लिए मन पर बलात् दबाव डाला जाता है, मन अपनी चंचलता के शिखर पर पहुँचकर बहुत नचाता है। इसीलिए ध्यान के लिए बारबार श्रेष्ठ चिन्तन के प्रवाह को बुलाना, उन्हीं में रमण करना ध्यान होने की स्थिति ला देता है। मानवी मन वस्तुतः जंगली हाथी की तरह है, जिसे पकड़ने के लिए पालतू-प्रशिक्षित हाथी भेजने पड़ते हैं। सधी हुई बुद्धि पालतू हाथी का कार्य करती है। ध्यान के रस्से से जकड़कर उसे काबू में लाती है और फिर श्रेष्ठ प्रयोजनों में संलग्न हो सकने योग्य सुसंस्कृत बनाती है।ध्यान के लिए इसी से सविचार स्थिति प्रारंभिक साधकों के लिए श्रेष्ठ है। धीरे-धीरे निर्विचार-निर्विकल्प स्थिति आती है। इसीलिए ध्यान में तन्मयता-तल्लीनता का भाव पैदा करने के लिए सृजनात्मक-विधेयात्मक चिंतन का अभ्यास करने की बात पर बार-बार जोर दिया जाता रहा है। तन्मयता की फलश्रुतियाँ अपार हैं। वैज्ञानिकगण अपने विषय में तन्मय हो जाते हैं और विचार समुद्र में गहरे गोते लगाकर नई-नई खोजों के रत्न ढूँढ़ लाते हैं। साहित्यकार-चिंतक-मनीषी तन्मयता के आधार पर ही राष्ट्रोत्थान के, समाज के नवनिर्माण के चिंतन को जन्म दे पाते हैं। तन्मय स्थिति में होना अर्थात् शरीर से परे होने का भाव पैदा कर स्वयं को विचार समुद्र में डुबा देना। लोकमान्य तिलक के जीवन की एक प्रसिद्ध घटना है कि जब उनके अँगूठे में एक फोड़े को चीरा लगाया जाना था, तो डॉक्टरों ने आपरेशन की गंभीरता बताकर दवा सुंघाकर बेहोश करने का प्रस्ताव रखा। उनने कहा कि “मैं अपने को गीता के प्रगाढ़ अध्ययन में लगा दूँ। आप बेखटके आपरेशन कर लें।” डॉक्टरों को सुखद आश्चर्य हुआ कि पूरी अवधि में वे बिना हिले-डुले गीता पढ़ते रहे-शान्तिपूर्वक आपरेशन करा लिया। पूछने पर इतना ही कहा कि “तन्मयता इतनी प्रगाढ़ थी कि आपरेशन की ओर ध्यान नहीं नहीं गया और दर्द भी नहीं हुआ।”विचारों के बिखराव का एकीकरण-चित्तवृत्तियों का निरोध यदि किया जा सके तो मनुष्य दुनिया के बुद्धिमानों की तुलना में असंख्य गुनी विचारशीलता, प्रज्ञा, भूमा प्राप्त कर सकता है, मात्र समझदार न कहलाकर तत्व द्रष्टा कहला सकता है। आत्मिक प्रगति का अभीष्ट प्रयोजन भी पूरा कर सकता है। मेडीटेशन-मनोनिग्रह की योग के प्रकरण में अक्सर चर्चा होती है, पर यह है वस्तुतः चित्त की वृत्तियों का अधोगामी चिंतन प्रवाह का निरोध एवं तदुपरान्त ऊर्ध्वीकरण। इसके लिए निराकरण ध्यान भी किया जा सकता है व साकार भी। कई व्यक्ति इसी ऊहापोह में रहते हैं कि कौन-सा ध्यान श्रेष्ठ है-निराकार या साकार। ध्यान उपासना के साथ जब भी जोड़ा जाता है, वह आत्मिक प्रगति के साथ भौतिक प्रगति का भी लक्ष्य पूरा करता है। ईश्वरप्राप्ति-जीवनलक्ष्य की प्राप्ति जैसे महानतम उद्देश्यों के कारण उपासना व ध्यान परस्पर जोड़कर किये जाते हैं व तुरंत लाभ भी देते हैं। विभिन्न संप्रदायों तथा विधियों में उसके प्रकारों में थोड़ा-बहुत अंतर भले ही हो, पर ध्यान का समावेश हर पद्धति में है।साकार ध्यान में भगवान की अमुक मनुष्याकृति को मानकर चला जाता है-उनके गुणों का ध्यान किया जाता है, वहीं निराकार ध्यान में प्रकाशपुँज पर आस्था जमाई जाती है। सूर्य जैसे बड़े आग के गोले-सविता देवता का ध्यान और प्रकाश बिन्दु जैसे छोटे आकार का ध्यान भी एक प्रकार का साकार ध्यान नहीं है। अंतर मात्र इतना ही है कि उसमें मनुष्य जैसी आकृति नहीं है। ध्यान के कई तरीके हैं, जिनमें से जिन्हें जो उपयोगी हो, वह करके लाभान्वित हो सकता है। प्रखर साधना वर्ष में सारे भारत व विश्व में अखण्ड जप के साधना-आयोजन चल रहे हैं। उन सभी में ध्यान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। बिना ध्यान का जप मात्र जीभ का व्यायाम है। जप में प्राण-प्रतिष्ठा ध्यान द्वारा की जाती है। अतः ध्यान को तकनीक न मानकर भाव प्रवाह के रूप में समझते हुए करने का अभ्यास यदि इष्ट मंत्र के जप के साथ किया जाय तो वह निश्चित ही जप को प्रभावी व फलश्रुति परक बना देता है।एक प्रकार का ध्यान प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य का, सविता देवता का किया जा सकता है। स्वर्णिम प्रकाश की किरणें साधक के शरीर में प्रवेश कर रही हैं एवं वह अंदर से बाहर तक निर्मल, पवित्र, प्रकाशवान होता चला जा रहा है। यह ध्यान सर्वश्रेष्ठ है एवं इसमें सतत् सूर्य के पापनाशक तेज से आत्मसत्ता के घिरे होने के भाव चित्र बनाए जा सकते हैं, प्रार्थना की जा सकती है कि यह तेज सभी कषाय-कल्मषों को नष्टकर सद्बुद्धि का उदय कर सत्कर्म की ओर प्रेरित कर दे। यदि उदीयमान सूर्य देख पाना हर किसी के लिए अपने आवा, कमरे, पूजाकक्ष कर स्थिति के कारण संभव नहीं है, तो ऐसे चित्र का ध्यान कर भावपटल पर ऐसा चिंतन किया जा सकता है।सूर्य का छोटा संस्करण है- दीपक। जलती हुई दीपक की लौ को थोड़ी देर खुली आँखों से देखना-फिर कुछ क्षणों के लिए आँखें बंद कर उसे भ्रूमध्य नासिका के अग्र स्थान पर जहाँ दोनों नेत्र मिलते हैं-ज्योति के रूप में देखना-ज्योति अवतरण की बिंदुयोग साधना कहलाती है। इससे बहिर्त्राटक व अन्तर्त्राटक की क्रियाओं द्वारा उसे साधकर पीनियल-पिट्यूटरी एक्सिस को- आज्ञाचक्र को जगाया जा सकता है। खुली आँखों से देखने का क्रम क्रमशः कम करते हुए लौ को बार-बार देखने का अभ्यास करना चाहिए, साथ में धीरे-धीरे मानसिक जप भी चलते रहना चाहिए व खींची श्वास के साथ पवित्र वायु के-ज्योतिष्मान प्रकाश के प्रवेश का भाव एवं छोड़ी हुई निश्वास के साथ मलीनता भरे विचारों के बहिर्गमन का भाव भी साथ-साथ किया जा सकता है। यह ध्यान बुद्धि-लब्ध भाव-लब्ध स्मृति बढ़ाने से लेकर अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों के द्वार खोलता है।एक ध्यान हिमालय का किया जा सकता है। परमपूज्य गुरुदेव हिमालय को अपना संरक्षक, अभिभावक व पारस कहते थे। चार बार यात्रा कर व सतत् हिमालय का ध्यान कर उनने अपने को दिव्यदर्शी, प्रज्ञापुरुष, अवतारीसत्ता के रूप में विकसित किया। हिमालय, अध्यात्म-चेतना का ध्रुव केन्द्र है। ऋषियों की तपःस्थली हिमालय से सतत् चैतन्य धाराओं का प्रवाह आ रहा है एवं मन-मस्तिष्क को शीतल बना रहा है-तपते हुए अंतःकरण पर ठंडे छींटे लगा रहा है-यह भाव किया जा सकता है।हिमालय सदा से ही अध्यात्म-पिपासुओं-जिज्ञासु साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। फिर उसका ध्यान तो निश्चित ही अलौकिक क्षमताओं का जागरण करने की शक्ति रखता है। इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर रही मानवजाति के तपते-तनावग्रस्त तन के लिए हिमालय का ध्यान-सतत् वहीं रमण करते रहने का चिंतन एक श्रेष्ठतम चिकित्सा-उपचार हो सकता है।एक और तरीका ध्यान का है-दर्पण में अपनी आकृति देखते हुए बार-बार आत्मबोध की स्थिति में अपने अंतस् को ले जाना। तत्वमसि, अयमात्माब्रह्म, सच्चिदानंदोऽहम् का भाव लाते हुए कि हम शरीर नहीं, हाड़-माँस का पुतला नहीं हम श्रेष्ठता की प्रतिमूर्ति हैं, भाव-संवेदनाओं का पुँज हैं-हम वही हैं जो भगवान हैं। हमें वैसा ही बनना है जैसे भगवान हैं। “मुखड़ा देख ले दर्पण में” शीर्षक वाले श्री प्रदीप के गीत पर जब प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों (1973-74) में ध्यान का क्रम चल पड़ता था तो साधक फूट-फूट कर रो पड़ते थे। उन्हें बार-बार स्मरण दिलाया जाता था कि अब तक जो जीवन जिया था वह एक पशु का था। अब मानव, देवमानव का जीवन जीना है। दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता। सारे विगत कर्मों का उसमें देखते हुए साधक को ईश्वरीय स्वरूप का बोध होता है। आभास होता है कि हमें अपने आपको अब क्या बनाना है।एक ध्यान अपने इष्ट पर किया जा सकता है। ध्यान में याद रखना चाहिए कि आकृति से पीछा छूटना आसान नहीं है। ध्यान-धारणा के सहारे आत्मचिन्तन का प्रयोजन पूरा हो सके, इसके लिए इष्ट चाहे वे शिव-पार्वती हों, शिवलिंग हों, भगवान श्रीकृष्ण, विष्णु, माँ गायत्री, अम्बा, भवानी, दुर्गा, सरस्वती अथवा गणेश या हनुमान एवं काबा का ध्यान हो, चाहे ईसामसीह का पैगम्बर का हो अथवा अपने गुरु का-उन पर मन आरोपित कर ध्यान को प्रगाढ़ बनाना चाहिए। इष्टदेव के समीप-अति समीप होने, उनके साथ लिपट जाने, उच्चस्तरीय प्रेम के आदान-प्रदान की गहरी कल्पना करनी चाहिए। इसमें भगवान और जीव के बीच माता-पुत्र स्वामी-सेवक जैसा कोई भी सघन संबंध बनाया जा सकता है। इससे आत्मीयता को अधिकाधिक घनिष्ठ बनाने में मदद मिलती है। भक्त अपनी अहंता-संकीर्णता को भगवान के इष्ट के चरणों में अर्पित करता है। भावना करता है कि यह सारी सत्ता-सारा वैभव उसी दैवी शक्ति की धरोहर है। सद्गुरु अथवा भगवान -किसी पर भी ध्यान आरोपित कर वह शक्ति पायी जा सकती है, जिसकी कि कल्पना भी नहीं की जा सकती।एक ध्यान जिस विपश्यना के रूप में भी प्रचलित माना गया है- खींची व छोड़ी श्वास पर ध्यान केन्द्रित करने का किया जा सकता है। हर श्वास को प्रेक्षक की तरह देखना व उस पर ध्यान केन्द्रित करना, धीरे-धीरे श्वासगति को कम कर पूरे शरीर को शिथिल करते चले जाना - यह इस ध्यान की मूल अचेतन क्रियाएँ हैं। इससे सारा शरीर सक्रिय ऊर्जा से भर जाता है। इसी की उच्चावस्था गायत्री की सोऽहम् साधना अथवा हंसयोग के रूप में बतायी गयी है, जिसमें अजपा जप भी चलता है, साथ ही खींची श्वास के साथ ‘सो’ तथा छोड़ी के साथ हम का भाव किया जाता है। ‘सो’ के साथ भगवत् चेतना का अंदर प्रवेश तथा ‘हम’ के साथ अपनी आत्मसत्ता का उसमें सराबोर होना-अपने अहं भाव को बाहर विसर्जित करना। ध्यान किसी भी पद्धति से हो, अपनी सुविधानुसार चयन कर नियमित उसे करते रहना चाहिए। अभी यहाँ ध्यान की कुछ पद्धतियाँ बतायी गयी हैं, अगले अंक में कुछ और पर प्रकाश डालकर साधकों का पथ प्रदर्शन किया जाएगा।Sadhak Anshit YouTube Channel: https://www.youtube.com/channel/UCqYj7sRAWZXrQJH5eQ_Nv9w
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THE SPIRITUAL YOGA RETREAT & ADVENTURE TOURGet ready to experience the yoga retreats like never before. Welcome to the Shiva Yoga Retreat Center which gives students an opportunity to experience a precise and affordable 10-day blissful Meditation and Yoga retreat Adventure, every month, throughout the year in Uttarakhand, India. Listen to the sweet sounding birds, the trickling waters of the holy river and be absorbed in the breath-taking view of our jungle location. Life at the Shiva Yoga retreat center provides an inner transformation to you as an individual. With proficient and notable yoga instructors imparting the ancient and traditional lifestyle of yoga, the stint with us will be a profound expeprience which you will treasure throughout your life. Come and explore your inner dimensions and the mystery of yoga.Post the completion of this course, you will get a 100 hours Yoga Certificate from Shiva Yoga Centre, a unit of Sadhana Yoga Institute Pvt. Ltd. (India) and Sadhana Yoga Foundation.SKILL LEVEL:• Beginner• Intermediate• AdvancedYOGA STYLES:• Ayurveda• Hatha• Yog Nidra• Ashtanga RETREAT HIGHLIGHTS:• 2 daily Yoga Classes• 1 daily Meditation Class• 1 daily Pranayama Class• The Himalayas & Holy Ganges Tour• Nature excursions• Daily meals• Jungle Tour Going on a yoga holiday is a great opportunity to release you from everyday stress. At the same time, there will also be incredible nature to indulge in. You will get to practice yoga twice a day and do fun activities in your leisure time. We guarantee you it will be a totally refreshing and nourishing experience! Join this journey to heal and strengthen your body in the beautiful India! This will be a wonderful opportunity to nourish your body - mind and achieve a better quality of life.The curriculum of our YOGA RETREAT meets and exceeds international standards. Our 10 days intensive yet enjoyable and enlightening Yoga Teachers Training Courses offer authentic and traditional teachings of yoga combined with the modern tools and techniques that successful yoga teachers require today. You journey begins at the yoga capital, RishikeshRishikesh has been the centre of spiritual and religious activities since ancient times. You will be warmly welcomed at the TAPOVAN VATIKA RESORT. Tapovan Vatika Resort is strategically situated, where the exquisite setting on the fast-flowing Ganges, Tapovan Vatika surrounded by forested hills, is conducive to meditation and mind expansion. Tapovan Vatika is just 5 Kms away from the Rishikesh main city, surrounded by Mountains & on right on the bank of River Ganga. Experience all shades of hill city Rishikesh with world class resort services with complete satisfaction.Places to See in Rishikesh• Lakshman Jhula.• Jumpin Heights.• Neelkanth Mahadev Temple.• Ram Jhula.• Triveni Ghat: The holy Ganges is worshipped at various ghats in Rishikesh among which the Ganga Aarti at Triveni Ghat is distinctively famous.• River Rafting.• Ancient Shiv TempleThe trip continues to the corbett city (Ramnagar).The mesmerizing beauty of this city will make your trip worth a jackpotPlaces To Visit In Corbett National Park:• Jim Corbett National Park.Includes 2 safaris into the wilderness. The tigers are the major attraction here and also the tusker elephants. • Ancient Girjiya temple.Situated in the midst of the river KOSI.• Corbett museum.Comprises of the tigers and other animals hunted down by the renowned Jim Corbett.About Your Yoga Teacher: Sadhak Anshit is a Certified Yoga teacher. He encountered the teaching while on the quest to heal himself from a near death experience of a road accident. When Doctors told him that he would never walk again, he took matters into his own hands and found the healing powers of Ashtanga Yoga, meditation and Pranayama. Today, Sadhak Anshit is one of the most recognized Yoga and Meditation teachers in India and spends most of his time teaching all over India.Sadhak Anshit started the Shiva Yoga Center with to ensure that every person coming here should experience ones inner strength through yoga and meditation. This is a powerful place designed for one to explore the inner aspects and continue the journey through the four main paths of yoga – Knowledge (Gyan Yoga) , Action (Karma Yoga), Energy (Kriya Yoga) and Devotion (Bhakti Yoga). For any queries, contact:Sadhak Anshit+91- 79053712399839414204E-mail: sadhakanshit@gmail.com
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